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Hindi Essay on “Dussehra”,”Vijaydashmi”, ”दशहरा”,”विजयदशमी ” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

विजयदशमी 

Vijaydashmi

या

दशहरा

Dussehra 

निबंध नंबर : 01 

त्योहारों के बहुआयामी स्वरूप वाले इस देश में विजयदशमी या दशहरा सारे देश में किसी-न-किसी रूप में मनाए जाने वाले प्रमुख त्योहारों में से एक हैं। यह वर्षो ऋतु की समाप्ति पर ही मनाया जाता है। इस दिन लोग गन्ना अवश्य चखते हैं, अत: किसी-न-किसी स्तर इसे ऋतु की नई फसल के साथ जुड़ा हुआ त्योहार भी कहा ही जा सकता है। यह इस बात से भी स्पष्ट हो जाता है कि इस त्योहार से नौ दिन पहले देवी-पूजा के नाम पर और रूप में लोग घरों में खेत्री (खेती) अर्थात जौ बोते हैं। आठवें या अष्टमी के दिन उनकी अंतिम पूजा कर देवी-भोग के रूप में कंजके बिठाते और उगे जौ की बालें बांटकर श्रद्धा से सिर-माथे लगाते और बालों में बांधते तक हैं। बाकी बचे हुए को जल में विसर्जन कर दिया जाता है। उसके बाद दसवें दिन दशहरा या विजयादशमी के त्योहार प्रकृति पर मानव की विजय, या पहली बार फसल पाने की खुशी में मनाया जाता है।

राजस्थान और आदिम वीर जातियों में विजयदशमी का त्योहार शस्त्रास्त्रों की पूजा के रूप में भी मनाया जाता है। कहा जाता है कि पुराने भारतीय वीरगण अपने शस्त्रास्त्रों की पूजा करके वर्षा ऋतु के बाद इसी दिन विजय अभियान शुरू किया करते थे। इस त्योहार के साथ कुछ पौराणिक कथांए जुड़ी हुई हैं। एक कथा के अनुसार, महिषासुर नामक एक राक्षस ने देव-समाज को बहुत आतंकित और पीडि़त कर रखा था तब ब्रह्माजी की सलाह से देवताओं ने अपनी शक्ति की प्रतीक देवी महादुर्गा को प्रगट किया। वह महिषासुर के साथ नौ दिन लगातार, भयानक युद्ध करती रहीं। दसवें दिन उसका वध करने में सफल हुई। उस विजय की याद में ही नवरात्रि में देवी की उपासना कर दसवें दिन विजय का आनंदपूर्ण त्योहार मनाते हैं। दूसरी कथा इस प्रकार है कि एक महर्षि के शिष्य के निर्धन होते हुए भी जब शिक्षा-समाप्ति पर गुरु-दक्षिणा देने के लिए हठ किया, तो ऋषि ने दस हजार स्वर्ण मुद्रांए लाने के लिए कहा। बात का धनी शिश्य स्वर्ण मुद्रांए प्राप्त करने के लिए दान के लिए प्रसिद्ध एक राजा के पास पहुंचा पर तब तक दान-यज्ञ करने के कारण उस राजा का कोश खाली हो चुका था। राजा एक याचक ब्रह्मचारी को खाली भी नहीं लौटा सकता था। अत: उसने धनदेव-कुबेर पर आक्रमण कर दस हजार स्वर्ण मुद्रांए लाने का फैसला लिया। राजा के आक्रमण की बात सुन कुबेर डर गया। रात के समय उसने शमीक नाक वृक्ष के माध्यम से स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा कर दी। सुबह जब राजा ने ब्रह्मचारी को सारी मुद्रांए ले जाने के लिए कहा तो उसने दस हजार से अधिक लेने से इनकार कर दिया। खैर, दस हजार मुद्रांए वह ले गया, बाकी राजा ने गरीबों में बांट दी। इस घटना की स्मृति में आज भी महाराष्ट्र आदि कुछ प्रदेशों में विजयदशमी के दिन शमीक वृक्ष के पत्ते इष्ट मित्रों और बंधु-बांधवों को शुभ मानकर भेंट किए जाते हैं। मूल रूप से विजय अर्थात देवता पर मनुष्य की विजय का भाव यहां भी स्पष्ट है। इस रूप में भी विजयदशमी का मनाया जाना सार्थक कहा जाएगा।

जो हो, विजयदशमी मनाने का जो सबसे अधिक प्रचलित और प्रसिद्ध कारण है, उसका संबंध मर्यादा पुरुषोत्तम राम और राक्षसराज रावण के साथ जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि रावण की कैद से सीता को छुड़ाने के लिए अपनी वानर-भालुओं की सेना के साथ्र राम लगातार नौ दिनों तक भयंकर युद्ध करते रहे। दसवें दिन जाकर समूचे वंश के साथ रावण का नाश हो सका। राम की रावण पर इस विजय को अन्याय पर न्याय, असत्य पर सत्य, राक्षण पर मानव की विजय आदि रूप में ही विजयदशमी का त्योहार मुख्य रूप से मनाया जाता है। इसके लिए महीनों पहले से तैयारी आरंभ हो जाती है। फिर व्यापक स्तर पर राम-लीलाओं का आयोजन किया जाता है। कथा-प्रसंगों के अनुरूप झांकियां निकाली जाती है। रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद के प्रतीक पुतले बनाकर, पटाखों से भरकर किसी खुले मेदान में खड़े किए जाते हैं। दसवें दिन या दशमी तिथि वाले दिन सांयकाल राम-लक्ष्मण उन पुतलों पर प्रतीकात्मक आक्रमण कर उनका वध करते हैं। फिर अंतिम संस्कार के रूप में उन पुतलों को आग लगा दी जाती है। धां-धांकर पटाखे चलते हैं और देखते-ही-देखते अन्याय, अत्याचार के प्रतीक रावण आदि जलकर राख हो जाते हैं। इस प्रकार रावण पर राम की विजय का यह कार्य संपन्न होता है। लोग परस्पर गले मिल, बधाइयां दे, मिठाइयां, फल आदि खा-खिलाकर विजय का आनंद मनाकर त्योहार का समापन करते हैं। विजय , उससे प्राप्त आनंद का भाव यहां भी प्रमुख रूप से रेखांकित किया जा सकता है।

इस प्रकार प्रति वर्ष बड़ी धूम-धाम से यह त्योहार मनाया जाता है। मनाने का कारण कोई भी क्यों न हो, वीरता, विजय और उससे प्राप्त आनंद का स्थायी भाव सर्वत्र मुख्य है। हम यह याद रखते हैं कि अन्याय-अत्याचार अधिक नहीं टिक पाता, अंत में उसे न्याय और सत्य के हाथों पराजित होना ही पड़ता है। इस मूलभाव को याद रखकर विजयदशमी का त्योहार मनाना ही सार्थक-सफल कहा जा सकता है। परंतु सखेद स्वीकारना पड़ता है कि अब अन्य त्योहारों की तरह यह भी परंपरा-निर्वाह के रूप में ही मनाया जा रहा है-सांस्कृतिक चेतना के रूप में नहीं।

 

निबंध नंबर : 02 

 

दशहरा अथवा विजयादशमी

Dussehra or Vijay Dashmi

                हिंदू धर्म में वर्ष भर अनेकों त्योहार मनाया जाता है। उनमें ष्दशहराष् का त्योहार प्रमुख है जिसे बच्चे, युवक व वृद्ध सभी वर्ग के लोग बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं। यह पर्व देश के सभी भागों में दस दिनों तक मनाया जाता है। इसमें प्रथम नौ दिन को नवरात्र तथा दसवें दिन को विजयादशमी के नाम से मनाया जाता है।

                                दशहरा हिंदी गणना के अनुसार आश्विन मास में मनाया जाता है। इस त्योहार की उत्पत्ति के संद्र्भ में अनेक पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं। अधिकाशं लोगों का मानना है कि भगवान श्रीराम ने अपने चैदह वर्ष के बनवास की अवधि के दौरान इसी दिन आततायी असुर राजा रावण का वध किया। तभी से दशहरा अथवा विजयादशमी का पर्व हर्षोल्लास के साथ परंपरागत रूप से मनाया जाता है।

                                                इस त्योहार का सबसे प्रमुख आकर्षण रामलीला  है जिसमें भगवान राम के जीवन-चरित्र की झलक नाट्य प्रस्तुति के माध्यम से दिखाई जाती है। रामलीला में उनकी बाल्य अवस्था से लेकर बनवास तथा बनवास के उपरांत अयोध्या वापस लौटने की घटना का क्रमवार प्रदर्शन होता है जिससे अधिक से अधिक लोग उनके जीवन-चरित्र से परिचित हो सकें और उनके महान आदर्शों का अनुसरण कर उनकी ही भाँति एक महान चरित्र का निर्माण कर सकें। रामलीलाएँ प्रतिपदा से प्रारंभ होकर प्रायः दशमी तक चलती हैं। दशमी के दिन ही प्रायः राम-रावण युद्ध के प्रसंग दिखाई जाते हैं। रामलीला दर्शकों के मन में एक ओर जहाँ भक्ति-भाव का संचार करती है वहीं दूसरी ओर उनमें एक नई स्फूर्ति व नवचेतना को जन्म देती है।

                                नवरात्र व्रत उपवास, फलाहार आदि के माध्यम से शरीर की शुद्धि कर भक्ति-भाव से शक्ति स्वरूपा देवी की आराधना का पर्व है। चैत्र माह में भी नवरात्र पर्व मनाया जाता है जिसे वासंतिक नवरात्र या चैती नवरात्र भी कहा जाता हैं। आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होने वाला नवरात्र शारदीय नवरात्र कहलाता है।

                                दुर्गा सप्तशती के अनुसार माँ दुर्गा के नौ रूप हैं जिन्हे क्रमशः शैल पुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघटा, कुष्मांडा, स्कंद माता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महामौरी तथा सिद्धिदात्री कहा गया है। माँ दुर्गा के इन्हीं नौ रूपों की पूजा-अर्चना बल, समृद्धि, सुख एंव शांति देने वाली है। यहाँ दुर्गा सप्तशती का यह श्लोक उल्लेखनीय है –

                                श्या देवी सर्व भूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता ।

                                नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमोनमः ।।

                                इस त्योहार के संदर्भ में कुछ अन्य लोगों की धारण है कि इस दिन महाशक्ति दुर्गा कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान करती हैं। नवरात्रि तक घरों व अन्य स्थानों पर दुर्गा माँ की मूर्ति बड़े ही श्रद्धा एंव भक्ति-भाव से सजाई जाती है। लोग पूजा-पाठ व व्रत भी रखते हैं।

                                विजयादशमी के त्योहार में चारो ओर चहल-पहल व उल्लास देखते ही बनता है। गाँवों में तो इस त्योहार की गरिमा का और भी अधिक अनुभव किया जा सकता है। इस त्योहार पर सभी घर विशेष रूप से सजे व साफ-सुथरे दिखाई देेते हैं। बच्चों में तो इसका उत्साह चरम पर होता है। वे ष्रामलीलाष् से प्रभावित होकर जगह-जगह उसी भांति अभिनय करते दिखाई देते हैं। किसानों के लिए भी यह अत्यधिक प्रसन्नता के दिन होते हैं क्योंकि इसी समय खरीफ की फसल को काटने का समय होता है।

                                दशहरा का पर्व हमारी सभ्यता और संस्कृति का प्रतीत है। यह बुराई पर अच्छाई की विजय को दर्शाता है। पराक्रमी एंव मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम का जीवन-चरित्र महान् जीवन मूल्यों के प्रति हमें जाररूक करता है। उनके जीवन चरित्र से हम वह सब कुछ सीख सकते हैं जो मनुष्य के भीतर आदर्श गुणों का समावेश कर उन्हें देवत्व की ओर ले जाता है। अतः हम सभी का नैतिक दायित्व बनता है कि इन महान आदर्शों का अनुसरण कर अपनी संस्कृति व सभ्यता को चिरकाल तक बनाए रखने में अपना सहयोग दें। 

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