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Hindi Essay on “Dr. Rajendra Prasad” , ”डॉ. राजेंद्र प्रसाद” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

डॉ. राजेंद्र प्रसाद

Dr. Rajendra Prasad

निबंध नंबर : 01

डॉ. राजेंद्र प्रसाद स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे। वह ‘जीरादेई के संत’ के नाम से प्रसिद्ध थे। उनका जन्म 3 दिसंबर, 1884 को बिहार के सारण जिले जीरादेई नामक ग्राम में हुआ था। उनके पिता श्री महादेव सहाय एक जमींदार थे। राजेंद्र प्रसाद अपने माता-पिता के पांचवें और सबसे छोटे पुत्र थे।

सन 1896 में छपरा के एक स्कूल में उन्होंने प्रवेश लिया। सन 1902 में वह कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा मेें सर्वप्रथम आए। वे ऐसे पहली बिहारी छात्र थे, जिन्होंने यह सफलता प्राप्त की थी। सन 1906 में उन्होंने बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। एम.ए. की परीक्षा में उनका स्थान सर्वोच्च था। वकालत की परीक्षा उन्होंने अच्छे अंकों में उत्तीर्ण की।

फिर क्या था-शीघ्र ही उच्च न्यायालय के वकील के रूप में उन्होंने ख्याति प्राप्त की। वकील के रूप में उनका निर्मल चरित्र और ईमानदारी देख सभी चकित थे। वकालत आरंभ करने से पूर्व मुजफ्फरपुर में कुछ समय तक एक महाविद्यालय में अध्यापन कार्य करते रहे। राजेंद्र बाबू जब पांचवीं कक्षा में पढ़ते थे, तभी उनका विवाह कर दिया गया। तब उनकी अवस्था मात्र बारह वर्ष की थी। उन्होंने अपनी आत्मकथा में अपने विवाह के समय की कुछ मनोरंजक घटनाओं का रोचक वर्णन किया है।

आगे चलकर उन्होंने वकालत के अपने अच्छे-खासे व्यवसाय को छोडक़र देश-सेवा करने की ठान ली। सन 1909 के बंग-भंग आंदोलन ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। उसके बाद सन 1917 में बिहार में महात्मा गांधी द्वारा छेड़े गए चंपारण सत्याग्रह से भी वे प्रभावित हुए। सन 1934 में बिहार भूकंप के दौरान उनकी सेवाओं को भला कौन भुला सकता है।

वह पहले कांग्रेस के महामंत्री रहे, फिर सन 1934 में उन्हें सर्वसम्मति से कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। वे कांग्रेस महासमिति के सन 1912 से और कार्यसमिति के 1922 से राष्ट्रपति पद ग्रहण करने के पूर्व तक बराबर सदस्य रहे।

सन 1946 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद भ्ज्ञारत में अंतरिम सरकार के मंत्री बने। 15 अगस्त, 1947 को देश जब आजाद हुआ तो उनकी अध्यक्षता में संविधान सभा का गठन हुआ। इस तरह डॉ. राजेंद्र प्रसाद की देख-रेख में ही हमारे देश का संविधान बना। नए संविधान में दी गई व्यवस्था के अनुसार देश में सन 1952 में पहला आम चुनाव हुआ।

सन 1952 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति का पद ग्रहण किया। वह राष्ट्रपति पद के लिए दो बार चुने गए-एक बार सन 1952 में और दूसरी बार 1957 में। सन 1942 में उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।

जब राजेंद्र बाबू राष्ट्रपति भवन गए तब वहां के ऐश्वर्य को देखकर सोच में पड़ गए। उन्होंने वहां के नरम गद्दोंवाले पलंग को हाथ से दबाते हुए कहा था ‘यह पलंग तो ऐसे ही हैं जैसे घी से भरा कनस्तर। कनस्तर में एक कटोरी छोड़ें तो वह बिना प्रयास के सरकती हुई नीचे तक जा पहुंचेगी। कुछ ऐसी ही हालत इस पलंग पर सोनेवाले व्यक्ति की भी होगी।’

उन्होंने तब आरामदायक पलंग को हटवाकर लकड़ी का एक तख्त लगवाया। उसी पर वह बारह वर्षों तक सोए।

उनकी विनम्रता अत्यंत सहज थी, ऊपर से ओढ़ी हुई नहीं थी। सहदयता उनमें कूट-कूटकर भरी हुई थी।

28 फरवरी 1963 में उनका निधन हो गया।

राष्ट्रपति ीावन छोडक़र सदाकत आश्रम जाते समय उन्होंने कहा था ‘मुझे राष्ट्रपति भवन में रहते हुए न तो प्रसन्नता थी और न ही झोंपड़ी में जाते हुए कोई दुख है।’

आचार्य विनोबा भावने ने उनकी तुलना राजा जनक से करते हुए कहा था ‘वह जब राष्ट्रपति थे तब भी उनकी सादगी बनी रही। राजा जनक भी बिहार में हुए थे और राजेंद्र बाबू भी। जनक जैसी निर्लिप्तता हमने राजेंद्र बाबू में ही देखी है।’

 

निबंध नंबर : 02

 

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद

Dr. Rajender Prasad

        बिहार प्रान्त में अनेक महापुरूषों ने जन्म लिया है। यहां जन्म लेने वाले महापुरूषों में अशोक, चाणक्य, चन्द्रगुप्त इत्यादि महापुरूषों की श्रेणी में डाॅक्टर राजेन्द्र प्रसाद का नाम भी आदर के साथ लिया जाता है। ये बचपन से ही प्रतिभा के धनी थे। जिस समय बिहार, बंगाल और उड़ीसा राज्यों की प्रवेशिका परीक्षा सम्मिलित रूप से होती थी, उस समय की प्रवेशिका परीक्षा में राजेन्द्र बाबू सर्वप्रथम आये। उनकी उत्तर पुस्तिका पर ’परीक्षार्थी परीक्षक से अधिक योग्य है’-अंकित किया गया, जो आज तक की परीक्षाओं के इतिहास का एक अद्वितीय दृष्टांत है। स्वतन्त्र भारत का प्रथम राष्ट्रपति बनकर राजेन्द्र बाबू ने ’होनहार बिरवान के होत चीकने पात’ की उक्ति को शत प्रतिशत चरितार्थ कर दिखाया। ऐसी महान् विभूति पर बिहार को गर्व और गौरव है।

        इस महान् विभूति का जन्म बिहार प्रान्त के सारण जिलान्तर्गत जीरादेई नामक गांव में 3 दिसम्बर 1884 ई0 में हुआ था। राजेन्द्र बाबू एक साधारण परिवार में जन्में थे। उनके घर में आर्थिक तंगी रहती थी। अतः राजेन्द्र बाबू का लालन-पालन आर्थिक तंगी में ही हुआ था। लेकिन आर्थिक तंगी पढ़ाई-लिखाई में बाधा नहीं बन सकीं। मैट्रिक से लेकर एम0ए0 तथा एम0 एल0 की परीक्षाओें में हमेशा ये सर्वप्रथम आते रहे। एम0एल0 पास करने के बाद इन्होंने वकालत शुरू की। इनकी वकालत खूब चलने लगी। परिवार वाले खुश थे, क्योंकि उनकी आर्थिक तंगी अब राजेन्द्र बाबू की सहायता से धीरे-धीरे समाप्त होने लगी थी। लेकिन राजेन्द्र बाबू से गुलाम भारत की दुर्दशा नहीं देखी गयी। परिवार के कष्ट से करोड़ों भारतीयों का कष्ट इन्हें ज्यादा दुःखदायी लगने लगा। अतः वकालत छोड़कर गांधीजी के नेतृत्व में ये आजादी की लड़ाई के सिपाही बन गये। सन् 1917 ई0 में जब महात्मा गांधी चम्पारण आन्दोलन के सिलसिले मे बिहार आये, तब राजेन्द्र बाबू ने उनका पूरा सहयोग किया। तभी लोग इन्हंे बिहार का गांधी कहने लगे। आजादी की लड़ाई मंे इन्हंे बहुत बार जेल जाना पड़ा। वहां इन्हें शारीरिक यातनाएं दी गयीं। फलतः शारीरिक रूप से कमजोर बाबू को दमें के रोग ने धर दबोचा, जो आजीवन रहा। फिर भी आजादी की लड़ाई में जुटे रहे। इनकी मेहनत और लगन को देखकर लोगों में यह विश्वास पैदा हो गया था कि ऐसे सपूतों के रहते यह देश परतन्त्र नहीं रह सकता। अन्ततः 15 अगस्त 1947 ई0 को यह कथन सत्य साबित हुआ।

        आजादी मिलने पर इनकी प्रतिभा के अनुरूप ही इन्हें भारतीय संविधान सभा का अध्यक्ष बनाया गया। इनकी मेहनत और प्रतिभा का ही फल था कि भारत अल्प समय में ही 90000 शब्दों का एक लिखित विशाल संविधान मिला। 23 जनवरी 1950 ई0 को सर्वसम्मति से ये गणतन्त्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति चुने गये। राजेन्द्र बाबू ने राष्ट्रपति भवन में रहकर जिस सादगी का परिचय दिया, वह अपने आप में एक अनूठी मिसाल है। ये राष्ट्रपति के गद्देदार बिछावन को हटाकर आम जनता की तरह चैकी पर सोते थे। राष्ट्रपति के 10,000 रूपये का वेतन इन्हें अधिक लगा। ये मात्र 2500 रूपये से अपना काम चलाते थे। इस प्रकार राष्ट्रपति भवन में रहकर ये राष्ट्रपति भवन के भोग-विलास से अपने आपको कोसों दूर रखते थे। मानों इनका जीवन राजा जनक की तरह हो-’जोग भोग मँह राख गोई’। अपनी अस्वस्थता के कारण 14 मई 1962 ई0 को राष्ट्रपति पद से अवकाश ग्रहण कर वे पटना के सदाकत आश्रम में एक सन्यासी की भांति रहने लगे। 21 जनवरी, 1963 ई0 को इनकी मृत्यु हो गयी। इनकी मृत्यु पर बिहार ही नहीं, पूरा देश रो पड़ा। इस महान् सपूत को देश ने ’देशरत्न’ की उपाधि से अंलकृत किया। इनका जीवन हम लोगों के लिए सदा प्रेरणा स्त्रोत रहेगा।

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