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Hindi Essay on “Bharatiya Samaj me Striyo ki Dasha” , ”भारतीय समाज में स्त्रियों की दशा” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

भारतीय समाज में स्त्रियों की दशा

Bharatiya Samaj me Striyo ki Dasha

 

प्रस्तावना- भारत एक प्राचीन सभ्यता एंव संस्कृति वाला देश है। यहां स्त्रियों का आदर देवी रूप मंे ही सम्मानपूर्वक किया जाता रहा है। प्राचीन काल में स्त्रियों को पूजा जाता था और यह समझा जाता था कि इनमंे शक्ति की देवी मां दुर्गा, ज्ञान की देवी सरस्वती तथा धन की देवी लक्ष्मी निवास करती है। पुराने समय मंे महान् ऋषि मनु ने कहा था कि श्जहां स्त्रियों की पूजा की जाती है वहां सभी प्रकार के देवी-देवता निवास करते हैं।

प्राचीन काल में स्त्रियों को पुरूषों के समान अधिकार प्राप्त थे। परिवार में उनका पद अत्यन्त प्रतिष्ठापूर्ण था।

प्राचीन काल में नारी का स्थान-वेदों और उपनिषदों के काल में नारी को पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त थी। उन्हंे पुरूषों के समात शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार था।

मण्डन मिश्र की पत्नी भारती भी अपने काल की प्रसिद्व विदूषी महिला थीं। उन्होनें अपने विद्वान पति को शास्त्रार्थ में पराजित करने के बाद शंकराचार्य से शास्त्रार्थ किया था।

मध्यकाल में नार का स्थान- मध्यकाल में नारियों की स्थिति में परिवर्तन हुआ। समाज की घृणित विचारधारा ने उनके सारे अधिकार छीन लिये। जो नारियां प्राचीनकाल में पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती थीं, मध्यकाल मंे उन्हे केवल घर की चारदीवारी तक ही सीमित कर दिया गया।

उन्हें हर समय पर्दा करने तो विवश किया गया तथा शिक्षा-प्राप्ति से वंचित कर घर का कामकाज करने का आदेश दिया गया।

ऐसा होने की वजह थी कि मुगलों तथा अन्य लुटेरे आक्रमणकारियों से भारतीय नारियों की अस्मिता सुरक्षित न रह गयी थी। लुटेरे उन्हें लूटकर ले जाते थे तथा सबल लोग भारतीय नारियों को बलपूर्वक अपने विलास गृह मंे भोग के लिए रख लेते थे। इससे बचाव के लिए पर्दा प्रथा ने जन्म लिया जो उस समय की आवश्यकता था। वीर पति के युद्व मंे वीरगति पाने के बाद भारतीय नारी ने पति के साथ सती हो जाना धर्म अनुकूल माना। इस तरह सती प्रथा का आरम्भ हुआ। बाद में बाल विवाह प्रथा भी इसी तरह कुरूति के रूप में पनपी।

नारी की इस दनी एवं असहाय दशा से क्षुब्ध होकर राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त ने इस अवस्था का चित्रण अपनी अग्रलिखित पंक्तियों में किया है-

अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी।
आंचल में है दूध और आंखों में पानी।।

वर्तमान काल में नारी का स्थान- वर्तमान काल में नारियों की स्थिति को सुधारने के लिए समय-समय पर अनेक महापुरूषों एवं राजनीतिज्ञों द्वारा हर सम्भव प्रयास किये गये। राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा को कानून द्वारा बन्द कराया। महर्षि दयानन्द ने बाज विवाह पर रोक लगवायी तथा पुरूषांे की भांति महिलाओं को भी एकसमान अधिकार दिये जाने पर बल दिया।
गाँधी जी ने भी स्त्रियों की दशा को सुधारने के लिए जीवन भर कार्य किये। भारत के स्वतंत्रता संग्राम मंे नारियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

आधुनिक युग में नारियों को पुरूषों के समान अधिकार प्राप्त हैं।

स्वतन्त्र भारत मंेे आज नारी के लिए प्रगति के सभी अवसर खुले गए हैं। आज के समय में आई0पी0एस0 अधिकारी डाॅक्टर, वकील, जज, राजनीतिज्ञ सभी कार्यालयों एवं दफ्तरों मे नारियां पदासीन हैं।

महिला उत्थान के लिए अनेक प्रकार के कानून एंव उत्तराधिकार नियम लागू किये गये हैं जिसमें शारदा ऐक्ट मुख्य है। इस नियम के द्वारा स्त्रियों को दशा को सुधारने का हर सम्भव प्रयास दिया गया है। उन्हें पुरूषों समान स्वतन्त्रता प्रदान की गयी है, आज वे भी पुरूषों के भांति कहीं भी जा सकती हैं, घूम सकती हैं, बैठ सकती हैं तथा अपनी योग्यतानुसार किसी भी पद पर कार्य कर सकती हैं। पिता की सम्पति में पुत्रों की भांति स्त्रियों को भी धनराशि प्राप्त करने का अधिकार है।

नारी उत्थान के सरकारी प्रयास- वर्तमान समय में महिलाओं की प्रगति एवं उत्थान के लिए सरकार अनेक प्रकार से प्रयत्न कर रही है। आज की स्त्रियां घर में केवल गृहिणी न रहकर अनेक प्रकार के कार्य कर रही हैं। वह घर के सीमित कार्यो को छोड़कर समाज सेवा में अपना ध्यान केन्द्रित कर रही हैं। सरकार द्वारा महिला उत्थान के लिए अनेक संस्थान एवं आयोग स्थापित किये गये हैं जिसमें नारियां अपनी शिकायतों को रखकर अपना खोया हुआ अधिकार एवं न्याय प्राप्त कर सकती हैं।

उपसंहार- आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में स्त्रियों ने पदार्पण कर लिया है। वह बाल-मनोविज्ञान, पाकशास्त्र, घरेलू चिकित्सा, छायांकन, शरीर विज्ञान तथा गृहशिल्प के अतिरिक्त ललित कलाओं चित्रकला, नृत्य, संगीत आदि में भी अपनी विशेषता प्रदर्शित कर रही हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है स्त्रियां देश का भाग्य बदलने में अत्यधिक उपयोगी सिद्व हो रही हैं। आज की नारी के संदर्भ में जयशंकर प्रसाद के महाकाव्य कामायनी की इन पंक्तियों मे उद्घृत किया जा सकता है-

नारी तुम केवल श्रद्वा हो, विश्वास रजत नभ या तल में
पीयूष स्त्रोत सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में।

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