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Hindi Essay on “Basant Ritu , ” बसन्त –ऋतु (ऋतुराज बसन्त)” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

निबंध नंबर : 01

बसन्त –ऋतु (ऋतुराज बसन्त)

Basant Ritu

भारत के प्राकृतिक सौन्दर्य को बढ़ाने वाली छ: ऋतुओ में से बसन्त ऋतु का महत्त्वपूर्ण स्थान है | इनमे सबसे अधिक मादक तथा आकर्षक ऋतु का आगमन मधु (चैत्र) तथा माधव (बैशाख) के महीनों में होता है | यह शिशिर ऋतु के समाप्त होने पर आती है | इसमें प्रकृति का सौदर्य सब ऋतुओ से बढ़ कर होता है |

बसन्त ऋतु के आगमन पर वृक्षों , पादपो तथा लताओं पर नई कोपले फूटने लगती है | इस ऋतु में आमो पर बौर आने लगता है | फूलो पर मुंडराती हुई तितलिया और मधुपान करने के लिए लालयित भ्रमर बड़े सुन्दर लगते है | इस रिती के आटे ही प्रकृति में नया जीवन आ जाता है | बाग़ – बगीचों में कोयले कूकने लगती है | खेतो में चारो और सरसों के पीले फूल ह्रदयो में मस्ती और आनन्द का सचार कर देते है | गुलमोहर, सूरजमुखी , चम्पा, गुलाब , गेदा, चमेली सब की अनुपम शोभा देखते ही बनती है |

इस ऋतु में आने वाले हो प्रसिद्ध त्यौहार है – बसन्त पंचमी तथा होली | बसन्त पंचमी का पर्व बसन्त आरम्भ होने के पाचवे दिन मनाया जाता है | ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती का जन्म बसन्त पंचमी को हुआ था | इस दिन बच्चे और महिलाए बसंती वस्त्र फन कर नाचते-गाते तथा खुशिया मनाते है | बसन्त पंचमी का दिन बहुत शुभ माना जाता है | अंत: नामकरण , विवाह आदि कई शुभ कार्य इसी दिन किए जाते है | घरो में प्राय: केसरिया रंग के चावल, हलुआ तथा अन्य मिष्ठान बनाए जाते है |

होली भी इस ऋतु के रंगो और मस्ती को प्रकट करने वाला त्यौहार है | यह प्रह्राद की बुआ होलिका के दाह के उपलक्ष्य में होलिकोत्सव के नाम से प्रसिद्ध है | यह हर वर्षफाल्गुन मास की पूर्णिमा को बड़ी उमंग से मनाया जाता है | ऋतु बसन्त सृष्टि में नवीनता का प्रतिनिधि बन कर आता है | इस ऋतु में न अधिक गर्मी होती है और न ही अधिक सर्दी | इस ऋतु में गावो की शोभा देखते ही बनती है | चारो और खेतो में गेहू की सुंगरी बाले देखने वालो को हर्ष-विभोर कर देती है | नर-नारी, बाल-वृद्ध सभी के ह्रदयो में अपूर्व उत्साह और आनन्द की तरंगे दौड़ने लगती है | अत : बसन्त के आगमन के प्रभाव से सारी दिशाए हरी-भरी , रंगीन तथा मदमस्त हो जाया करती है |

 

निबंध नंबर – 02 

 

बसंत ऋतु

Basant Ritu

हमारा देश भारत के प्रकृति की अनोखी क्रीड़ास्थली है। प्रकृति अपने नए-नए रूपों में आकर अपनी शोभा का प्रदशन करती है। जहां छह ऋतुएं बारी-बारी आकर श्रंगार करती है। सभी ऋतुओं की अपनी-अपनी विशेषता एंव शोभा है और अपनी-अपनी महत्ता है। हेमंत ऋतु में प्रकृति उस ठगी हुई नारी के समान दिखाई देती है जिसके रूप में उसका मुख चंद्रमा के समान प्रतीत होता है और उसके बाद आती है चिर प्रतीक्षित बसंत ऋतु।

भारत में प्रत्येक ऋतु का समय प्राय: दो-दो महीनों का होता है। ज्येष्ठ और आषाढ़ में ग्रीष्म, श्रावण और भादों में वर्षा, अश्विन-कार्तिक में शरद, मार्ग-पौष में हेमुंत, माघ और फाल्गुन में शिशर और चैत्र और बैसाख में बसंत।

बसंत ऋतु का समय अंग्रेजी गणना के अनुसार 15 फरवरी से 15 अप्रैल तक माना जाता है। इस ऋतु में न तो अधिक गमी्र और न ही अधिक सर्दी बसंत के आने से पूर्व शिशिर और हेमंत ऋतु की कड़ाके की सर्दी को प्रकृति नहीं सह पाती। इसलिए पुष्प मुरझा जाते हैं। पत्ते सूख जाते हैं। हेमंत तो पतझड़ के रूप में आकर वृक्षों का पत्र विहीन कर देती है। पेड़ ठूंठ हो जाते हैं और तब आगमर होता है ऋतु राज बसंत का जिसके मादक स्पर्ष पाकर पृथ्वी का रोम-रोम रोमांचित हो उठता है। वृक्षों में नए पत्ते आने लगत ेळें। आम के वृक्षा मंजरियों से लद जाते हैं। कोयल पंचम स्वर में कूक उठती है, नवविकसित कलियां अंगड़ाइयां लेने लगती है। रंग-बिरंगी तितलियां फूलों पर मंडराने लगती है। भ्रमरों के गु्रजन से उपवन गूंजने लगता है। शीतल-मंद सुगंधित समीर का स्पर्श पाकर जन-मन में गुदगुदी पैदा होने लगती है।

पौराणिक कथा के अनुसार बसंत को रूप सौंदर्य के देवता कामदेव का पुत्र बताया है। रूप सौंदार्य के देवता कामदेव के घर में पुत्रोत्पति का समाचार पाते ही प्रकृति नृत्य करने गती है और उसके अंग-प्रत्यंग थिरकने लगते हैं। तरह-तरह के फूल उसके आभूषण बन जाते हैं तथा कोयल की कूक उसकी मधुर स्वर पीली-पीली सरसों ठंडी हवा में लहराकर ऋतुराज के आने की घोषणा करती है। कामदेव का पुत्र बसंत वृक्षों की डालियों के झूले में सोया हुआ रहता है। प्रात: काल होते ही गुलाब चटकारी देकर उसे जगाने का प्रयास करना पड़ता है:

डार दु्रम पलना बिछौना नव पल्लव के

सुमन झगुला-सा है तन छवि भारी दे।

मदन महीपजु के बालक बसंत ताहि

प्राहित जगावत गुलाब चटकारी दे।

होली, बसंत पंचमी जैसे त्यौहार इसी ऋतु में आते हैं। किसानों के लिए यह ऋतु सुख का संदेश लाती है। उसके खेतों में खड़ी सरसों ऐसी प्रतीत होती है कि पृथ्वी ने पीली चुनरी ओढ़ ली हो तथा धरती एक नई-नवेली दुल्हन  बन गई हो। बसंत के सौंदर्य से अभिभूत होकर सर्वेश्वर दयाल जी कहते हैं-

आए महंत वसंत

मखमल से झूले पड़े हाथी-सा टीला

बैठे किंशुक छत्र लगा बांधा पाग पीला

चँवर सदृश डोल रे सरसों के सर अनंत

आए महंत वसंत।

किवंदती है कि पंचमी के दिन ही ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती का अविभार्व हुआ इसलिए इस दिन सरस्वती पूजन भी किया जाता है। यह दिन हिंदी के महान कवि निराला जी की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है।

बसंत ऋतु स्वास्थ्य के लिए अति उत्तम होती है। इन दिनों में शरीर में नए रक्त का संचार होता है। बसंत, उत्साह उमंग, सौंदर्य तथा हर्षोल्लास का त्यौहार है।

 

निबंध नंबर : 02 

 

बसंत ऋतु

Basant Ritu

ऋतुओं का राजा वसंत, कितना सुंदर! कितना मोहक! भारत-भूमि को ही यह परम सौभाज्य प्राप्त है कि यहां साल में छ: ऋतुओं का अलग-अलग स्वाद चखने और आनंद भोगने का सुख प्राप्त होता है। संसार के बाकी देशों में दो ऋतुएं ही मुख्य रूप में रहती हैं। कहीं सदाबहार शीत ऋतु और कहीं कड़ाकेदार ग्रीष्म ऋतु। कुछ ही देश हैं, जहां थोड़े समय तीसरी वसंत ऋतु के भी दर्शन हो जाते हैं, अन्यथा विश्व के अनेक देश तो दो के सिवाय तीसरे के रंग-रूप और प्रभाव से तो क्या नाम तक से भ्ज्ञी परिचित नहीं है। है न प्रकृति की यह विचित्र बात!

भारत में मान्य ऋतु-चक्र वसंत से आरंभ होता है। वसंत के बाद ग्रीष्म फिर क्रम से वर्षा, शरद, शीत और शिशर या पतझड़ ऋतुएं आती हैं। इनमें से शरद को यदि ऋतुओं की रानी कहा जाता है तो वसंत को ऋतुराज। वसंत अपने प्राकृतिक वैभव-विकास की संपन्नता के कारण वास्तव में है भी सभी ऋतुओं का राजा कहलाने के योज्य। इसका आगमन कड़ाके की सर्दी वाली ऋतु पतझड़ या शिशिर के बाद होता है। इसके पदार्पण करते ही प्रकृति और मौसम के तेवर अपने-आप ही बदलने लग जाते हैं। चारों ओर का सारा वातावरण गुलाबी-गुलाबी हो उठता है। प्रकृति का रंग-रूप  भी गुलाबी ओर ठंडक भ्ज्ञी गुलाबी-यानी सभी कुछ सुंदर, आकर्षक, मनमोहक और आनंददायक। शिशिर ऋतु की मार से आहत-पीडि़त पेड़-पौधे पत्तों-फूलों के नए-नए परिधानों से सजने-संवरने लगते हैं। वृक्षों के सहारे ऊपर उठती लतांए हरी-भरी हो और फूलकर रंगीन होते वृक्षों से लिपट झूम-झूम जाती हैं। मंद-मंद बहती हवा नए खिले फूलों, बौराए फल-वृक्षों की भीनी-मधुर सुगंध चुराकर सारे वातावरण में बांट आती है। फलस्वरूप वातावरण के साथ-साथ तन-मन भी महक उठते हैं। मखमली घास उन मंद झोंकों से लोगों के पांवों बिछ जाती है। उस पर घने पत्तों की ओट में छिपकर बैठी कोयल जब अचानक कुहुक उठती है, तो वास्तव में युवक-युवतियों, प्रेमियों-विराहियों के तन-मन में भी एक हूक और सिहरन भर उठती है। सचमुच, ऋतुराज वसंत का सौंदर्य और प्रभाव निाराल और अचूक है। घास पर पड़ी ओस की बूंदें तन-मन को एक अनोखी तरावट प्रदान कर ऋतुराज वसंत को जैसे स्वच्छ-सच्चे मोतियों के हार पहना उसका स्वागत करने लगती हैं। परंतु सखेद स्वीकार करना पड़ता है कि आज के विषम नगरीय वातावरण में हम वसंत ऋतु का आनंद नहीं ले पाते। उसके आने-जाने का प्राय: पता ही नहीं चल पाता।

वनों-बागों से निकल अब तनिक हरे-भरे और पीला श्रंगार किए सरसों के खेतों की ओर चलिए। लगता है जैसे खेतों का जर्रा-जर्रा दूर-दूर तक कोमल कांत बासंती रंग में रंगा जाकर महक-लहक उठा हो। वह मादकता तन-मन में भरकर एक नई ऊर्जा और उत्साह का संचार कर देती है। फिर जब प्रकृति का कोई राजकुमार कृषक कुमार या राजकुमारी कृषक कन्या उन खेतों की मेंड़ पर किसी मधुर गीत का अलाप भर उठते हैं, तब तो लगने लगता है, जैसे ऋतुराज वसंत का पोर-पोर गीत और वृक्षों की मर्मर ध्वनि के संगीत की धुनों पर नाचने लगा है। उसी समय कोयल की कहीं दूर सु सुनाई देती कुहुक एक बार फिर रोम-रोम को संगीतमय बनाकर आकुल-व्याकुल कर देती है। वास्तव में ऐसा ही होता है ऋतुराज वसंत के दर्शन का अदभुत आनंद और उत्साह, जो गांव के वातावरण में तो कुछ मात्रा में आज भी सुलभ है, पर नगरों में तो कतई नहीं।

वसंत ऋतु की पंचमी तिथि को कई स्थानों पर मेले भी जुड़ते हैं, कई प्रकार के उत्सव-समारोह भी मनाए जाते हैं। विशेषकर युवती ललनांए जब धानी और पीले परिधान ओढक़र उन मेलों-उत्सवों में इधर-उधर घूमती दीख पड़ती हैं, तब तो लगता है जैसे स्वंय वसंत ने ही कई-कई साकार स्वरूप धारण कर लिए हों। सौंदर्य और योवन जैसे चारों और साकार हो उठा हो। इस प्रकार ऋतुराज वसंत सौंदर्य और आनंद का प्रतीक है। पर कहा जाता है कि वसंत का यह मादक सौंदर्य विरहियों के लिए विशेषकर दुखदायी हो जाया करता है। हो जाया करता होगा। पर हमारा अनुमान है कि विरह की यह पीड़ा भी एक प्रकार के सौंदर्यमय आनंद की सृष्टि करने वाली ही होती हरेगी। भला यौवन और सौंदर्य की ऋतु में दुख-पीड़ा की असुंदरता का क्या काम। आज की हमारी मानव-सभ्यता-संस्कृति जिन राहों पर बढ़ रही है, उनमें वसंत ऋतु का आनंद और शोभा एक किताबी वस्तु ही बनती जा रही है। वनों-उपवनों में बस्तियों के जंगल उगकर स्वंय मनुष्य ही प्रकृति का नाश कर रहे हैं। इसे दुर्भाज्य का सूचक कहा जा सकता है और कुछ नहीं।

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