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Hindi Essay on “Bal Majdoor ki Samasya” , ”बाल मजदूरी की समस्या” Complete Hindi Essay for Class 9, Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

बाल मजदूरी की समस्या 

Bal Majdoor ki Samasya 

 

बच्चा उस पनीरी या नन्हीं पौध के समान हुआ करता है, जिसको भविय के खेतों में बोकर पूर्ण पकी फसल, या फल-फूलों-पत्तों से लदे विशाल वृक्ष बनना होता है। इसी कारण आज के बच्चे को भविष्य का नागरिक और माता-पिता कहा जाता है। यह फसल, ये वृक्ष, भविष्य के ये माता-पिता, नागरिक और हमारी जातीय, देशीय, राष्ट्रीय वंश-बेला समुचित परिचालन, पोषण एंव विकास पाकर उचित रूप में फल-फूल या संवृद्धि पा सके, यह सब देखना किसी देश-राष्ट्र के वर्तमान समाज और सरकार का पहला परम कर्तव्य हुआ करता है। प्रश्न उठता है कि क्या हमारा देश अपने इस दायित्व का निर्वाह कर पाने में समर्थ हो पा रहा हे? उत्तर ‘नहीं’ में ही मिलता है। तभी तो जब हम नन्हें-मुन्नें बच्चों को मनमर्जी का खा-पी, अच्छे और साफ-सुथर कपड़े पहन हाथों में पाठय-पुस्तकें लेकर स्कूलों में जाते न देख कहीं बूट-पालिश करते हुए, किसी ढाबे में जूठे बर्तन मलते हुए देखते हैं तो वस्तुत: मन भर आता है। वह आंसू बनकर बह जाना चाहता है। बार-बार यह प्रश्न हथौड़े की तरह बजने और बिजली की तरह कौंधने लगता है कि क्या यही भविष्य की फसल और भरे-पूरे वृक्ष हैं? यही भावी नागरिक, माता-पिता और हमारी राष्ट्र-वंश-बेल के संवद्र्धक हैं? इतना ही नहीं, तब आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की सारी उपलब्धियां, राष्ट्र की सारी प्रगतियां भी आधी-अधूरी और बेबुनियाद लगने लगती है। कितनी विषमता है यह! कितना आधा-अधूरापन और स्वतंत्रता का बोध है यह। यह बोध प्रकट करता है कि हमारी कथनी-करनी में वस्तुत: आकाश-पाताल का अंतर है, जिसे उचित एंव भविय के लिए सुखद नहीं स्वीकार जा सकता।

बाल-श्रमिक-समस्या वस्तुत: आज केवल भारत में ही नहीं, भारत जैसे विकासशील राष्ट्रों में ही नहीं, बल्कि समृद्ध राष्ट्रों में भी भयावह रूप धारण करती जा रही है। आखिर कौन होते और कहां से आते हैं ये बाल-श्रमिक? निश्चय ही समाज-शास्त्रीय अध्ययन का विषय है। कुल बाल-श्रमिक अपने निर्धन-लाचार मांग-बाप के साथ मिलकर उनका हाथ बंटाते या छोटे-मोटे स्वतंत्र काम कर बदले में कुछ पैसे पाकर मां-बाप का हाथ बंटाते हैं। कई बार दूर-देहातों के बालक घरेलू विषमता, दरिद्रता, उस पर मांग-बाप की उपेक्षा और नाहक मार-पीट से तंग आकर कस्बों-शहरों की ओर रुख करते हैं। वहां आकर कई बार कुछ अच्छे लोगों के हाथ पड़ मेहनत-मजदूरी कर पेट पालने लगते हैं। परंतु उपेक्षा, अपमान और कठोर श्रम उन्हें यहां भी सहना ही पड़ता है। कई बार ऐसे बच्चे असामाजिक तत्वों के हााि पड़ अपने लिए नहीं बल्कि उनके लिए रात-दिन श्रम करने को विवश हो जाया करते हैं। पीड़ादायक मार और प्राण लेने की धमकी के भय से वे मुंह नहीं खोल पाते। उन बच्चों की भी यही दशा होती है, जिन्हें असामाजिक तत्व लोभ-लालच से बरगलाकर ले आया करते हैं। एक श्रेणी बंधुआ बाल-श्रमिकों की भी है। इनका सारा जीवन माता-पिता द्वारा लिए गए ऋण का ब्याज चुकाने की भेंट हो जाया करता है। इस प्रकार निर्धनता, अज्ञानवश मां-बाप का दुव्र्यवहार, असामाजिक तत्वों के हथकंडे और ऋण भारत समेत सभी देशों में बाल-श्रमिकों के यही मूल स्त्रोत स्वीकारे गए हैं।

अब स्वाभाविक प्रश्न उठता हे कि इनकी मुक्ति का उपाय क्या है? हमारे विचार में इसका एक मुख्य उपाय यह हो सकता है कि समाज और सरकार प्रत्येक बच्चे की देखभाल का दायित्व स्वंय संभाल ले। ऐसा समाजवादी एंव कुछ जनतंत्री देशों में हो भी रहा है। दूसरा उपाय है, विशेष आयु-सीमा के बच्चों से श्रम लेने पर कठोर कानूनी अनुशासन लागू किया जाए। शायद ऐसा कानून है भी पर उसका पालन नहीं हो रहा। नैतिकता का अभाव और भ्रष्टाचार उन कानूनों का पालन नहीं होने देता। तीसरे प्रत्येक बच्चे के लिए शिक्षा अनिवार्य और मुफ्त होनी चाहिए। वह भी वर्तमान शुष्क-नीरस ढंग से नहीं, बल्कि रोचक एंव जीवन के भावी स्वरूप को ध्यान में रखकर। मुख्य रूप से यदि ये उपाय स्वच्छ एंव कठोर अनुशाासन के रूप में लागू किए जा सकें तो बाल-श्रमिक समस्या समाप्त हो सकती है। अन्यथा वर्तमान अव्यवस्थित परिस्थितियों में तो हम इस नासूर को ह्दय में छिपाए रखने के लिए बाध्य हैं ही, भविष्य में यह समस्या और भी भयावह एंव कष्ट-साध्य हो जाएगी। देश का भविष्य असमय में ही मुरझाकर काल-कवलित हो जाएगा। उसे बचाना बहुत आवश्यक है। उसके लिए तत्काल उपर्युक्त उपायों को क्रियान्वित करना चाहिए।

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