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Hindi Essay on “Badh ka ek Drishya ” , ”बाढ़ का एक दृश्य” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

बाढ़ का एक दृश्य

Badh ka ek Drishya 

प्रकृति और मानव के बीच संघर्ष अंनतकाल से जारी है। मानव-जीवन के विरुद्ध प्रकृति के जो अनेक प्रकार के प्रकोप सामने आते रहते और माने जाते हैं, बाढ़ का प्रकोप उनमें से अत्यंत भयावह माना गया है। वह जल, जो जीवन का पर्यायवाचक माना जाता है, पानी जो व्यक्ति की अस्मिता और इज्जत का, मान-स मान का प्रतीक स्वीकारा गया है वही जल सभी प्रकार की सीमांए तोडक़र अबाध गति से बहने और बढऩे लगता है, तब उसकी उस दिशाहीन गतिविधि को ‘बाढ़’ और उसका प्रकोप कहा जाता है। तनिक उस व्यक्ति की स्थिति पर सोचकर देखिए जो घर में बैठा काम कर रहा या चारपाई पर लेटा विश्राम कर रहा है। तभी अचानक शांय-शंय करता पानी का प्रवाह आकर उसे घेर लेता है। चाहकर, हाथ-पांव मारकर भी वह वहां से निकल, या बचकर भाग नहीं पाता, पानी के बढ़ाव के साथ-साथ उसके सांस ऊपर नीचे हानेे लगते और फिर धीरे-धीरे घुटकर तड़प बनने लगते हैं। अंग-अंग से छटपटाहट भर कर अंत में वह व्यक्ति डूब जाता है। उसका शरीर पानी से भर, सड़-गलकर फूल जाता है। जब वह पानी पर तैर आता है, तो उसे देखकर कितनी घिन आती है। यही दशा बाढ़ में फंसकर मरे जानवरों की भी हुआ करती है। बाढ़ का प्रकोप कितना भयानक हुआ करता है इससे उसका सहज ही अनुमान हो जाता या किया जा सकता है।

ऐसी ही एक भयावह बाढ़ में फंसे ओर उसकी भयावहता का निकट से अनुभव करने का अवसर एक बार मुझे भी प्राप्त हुआ था। आज भी उसकी बात सोचकर रोंगटे खड़े होने लगते हैं। उसी का वर्णन यहां करने जा रहा हूं। ओह! कितना भयावह, कितना लोमहष्ज्र्ञक था बाढ़ का वह दृश्य।

उस वर्ष भीषण गर्मी पडऩे के बाद समय पर ही वर्षा शुरू हो गई थी। शुरू-शुरू में तो रुक-रुक कर वर्षा होती रही, अत: सभी को बहुत अच्छा लगा। भीषण गर्मी के बाद वर्षा की फुहारों में नहाना सचमुच बड़ा अच्छा लगता है। हमें भी बड़ा अच्छा लगा। प्राय: रोज ही फुहार शुरू होते ही हम कपड़े उतार आंगन में नहाने लगते और तब तक नहाते रहते कि जब तक तेज वर्षा होकर रुक न जाती। यहां पर बता देना आवश्यक है कि तब हम जिस बस्ती में रहा करते थे, वह यमुना तट से कुछ ही दूरी पर थी। वर्षा शुरू हो जाने के कारण सूखकर पतली पड़ गई यमुना की धारा भी अब मुटाकर बेडौल-सी होने लगी थी। लगता था कि उस बेडौलता में भी योवन की खामस्तियां लहराने और मचलले लगी है। कुछ ही दिनों तक वह धारा फैलती-मुटाती किनारों तक आ पहुंची। फिर एक दिन देखा कि उसका प्रवाह कुछ तेज होता जा रहा है। फलस्वरूप प्रवाह जब तेज गति से आकर किनारों से टकराता, तो मिट्टी के टूटकर गिरने की आवाज दूर तक सुनाई दे जाती। क्योंकि हर वर्ष ही वर्षा ऋतु में प्राय: ऐसा ही हुआ करता था अत: हम निश्चिंत रहकर वर्षा और यमुना के उभार का आनंद लेते। कभी-कभी समाचार-पत्रों में छपने वाला यह समाचार अवश्च चौंका देता कि इस बार यमुना के कछारों और निकास-स्थान के पहाड़ों पर भीषण वर्षा हो रही है। हम समाचार पढ़ते-सुनते और मात्र चौंककर ही रह जाते। इस प्रकार कुछ दिन और बीत गए। रुक-रुककर कभी धीमी और कभी तेज, वर्षा का क्रम जारी रहा।

उस दिन सुबह से ही घनघोर घटांए घिरने लगीं। घटांए क्रमश: सावन से सघनतम होती गई। हवा भी रुक गई, जिस कारण वातावरण गहरा और उमस से भर-कर दमघोटू सा हो गया। आधा दिन बीत जाने के बाद वह दमघोटू वातावरण भंग हुआ पुरवैया पवन पहले धीमी और फिर जोर-जोर से चलने लगी। कुछ ही क्षण बाद बादल गरजे और बिजली कडक़ड़ाकर कभी लंबी और कभी आढ़ी-टेढ़ी रेखांए खींचने लगी। उसके बाद एकाएक तड़-तड़ की आवाज ने सारे वातावरण को छा लिया और देखा कि लगातार बारिश होने लगी है। वह बारिश अगले दिन भी नहीं रुकी। सारे काम-काज ठप्प हो गए। उस पर सितम यह कि एक-दो भूकंप के झटके भी लगे, जिससे डरकर एक बार तो वर्षा की भयानकता की परवाह किए बिना लोग घरों से बाहर निकल आए। कुछ दिन बाद भी भीगे-सूखे लोग वापिस घरों में जाने का साहस जुटा सके। वह रात बीती परंतु वर्षा अब भी रुकने का नाम नहीं ले रही थी। बाहर देखने पर लगता कि जैसे जल-थ एक हो गया है। धीरे-धीरे वर्षा का वह पानी बढऩे और ढलवें घरों में भरने लगा। इससे हम सभी घबरा उठे और ‘राम ागवान, रक्षा करो’ आदि की गुहार करने लगे। शायद हमारी गुहार सुन ली गई और आधी रात के बाद बाढ़ की अनुभूति देकर वर्षा थम गई। सुबह तक धीरे-धीरे पानी भी उतर गया और अगले दिन लोग अपने काम पर भी गए। वह दिन ठीक बीता। फिर रात आई और खा-पीकर हम लोग सो गए। कोई आधी रात बीतने पर चारों ओर शोर-सा होने लगा। शोर सुनकर आंख खुल गई। जैसे ही पांव नींचे रखा, दंग रह गया। कलछल की आवाज करता पानी पिंडलियों तक ऊंचा होकर कमरे के भीतर बह रहा था। चप्पलें पता नहीं कहां चली गई थीं। चिल्लाकर मैंने घर के बाकी सदस्यों को जगाया। सभी हैरान-परेशान हुए और आंखे फाड़-फाडक़र देखने लगे। पानी बढ़ता जा रहा था। मैंने चिल्लाकर घर वालों से कहा-यह देखने-सोचने का समय नहीं। जो कुछ भी कीमती सामान उठाया जा सकता है, उठाकर निकल चलने का है। नहीं तो पानी बढक़र हमें भी अपने साथ बहाकर ले जाएगा।

जो सामान थोड़ा-बहुत उठ सकता था, उठकर हम यानी में छप-छप करते बाहर गली में आ गए। आस-पास के बाकी लोग भी यही सब कर रहे थे। एक तो अंधेरी रात उस पर निरंतर बढ़ रही बाढ़ का पानी, पता नहीं था कि हम लोगों का क्या होगा। हम तेजी से चलने की कोशिश कर रहे थे, परंतु पानी पीछे ढकेल रहा था। बड़ी मुश्किल से हम लोग नदी के ऊंचे पुश्ते पर पहुंच पाए। उठाया सामान एक जगह रखकर सांस लिया। कुछ ही देर में हमारे चारों तरफ आदमियों, बाढ़-पीडि़तों की भीड़-सी लग गई। स ाी परेशान और साथ कुछ भी न ला पाने को रोना रो रहे थे। इधर-उधर बैठकर पहाड़-सी भारी वह रात गुजारी। सुबह स्वंयसेवी दल और सरकारी दल बाढ़-पीडि़तों की कम और अपनी अधिक सहायता करने को आ गए। गुड-चने, दूध-डबलरोटी, पूरी-सब्जी आदि का वितरण हुआ। सनाथ होते हुए भी अनाथों की तरह से वह सब स्वीकारने को हमें इस वर्षा और बाढ़ ने बाध्य कर दिया था।

घरवालों को कहकर कुछ देर बाद मैं पानी की धारा के एकदम करीब आकर खड़ा हो गया। बाढ़ की धार का दृश्य बड़ा ही डरावना था। ढोर-डंगर तिनकों की तरह बहे जा रहे थे। एक पेड़ बहता हुआ आया, जिसकी डाल पर एक सांप लटक रहा था और एक तरफ एक प्राणी। तभी दूर से एक छत बहती हुई आ रही दि शाई दी। उस पर बैठे कुछ लोग सहायता के लिए लगातार चिल्लाए जा रहे थे। मैंने उन्हें बचाने के लिए एक मोटर लांचर करे भी पीछे जाते देखा। कई बार बाढ़ के तेज पानी में उतरते-चढ़ते मनुष्यों के सिर-शरीर भी दिखाई दे जाते। उन्हें देखकर रोम-रोम कांप जाता और प्रकृति के सामने मानव की निरीहता पर ऐसा लगने लगा जैसे ज्ञान-विज्ञान की इतनी प्रगतियों का प्रकृति के लिए तनिक भी महत्व नहीं है।

वहां बस्ती में बुरी हालत थी। कमरों को भीतर से देखकर लगता था कि बाढ़ का पानी छतों को छूने की हरचंद कोशिश करता रहा है। हमारे घर की एक दीवार ढह गई थी। पड़ोस का तो पूरा मकान ही जैसे समाप्त हो गया था। उसकी छत खोजने पर भी नहीं मिल पा रही थी। कई घरों के कीमती सामान गायब थे। या तो वे बहकर मिट्टी में मिल चुके थे, या फिर पुलिस आदि की सहायता से बाढ़ में भी नौकाएं लेकर स्वतंत्र घूमने वाले असामाजिक तत्वों द्वारा इधर-उधर कर दिए गए थे। जहां बस्ती और मकान कुछ निचान पर थे, वहां अ ज्ञी तक पानी भरा था। उस पर मच्छरों का अनवरत तांडव हो रहा था। अगले दिन हमें पता चला था कि आस-पास की झुज्गी झोंपड़ी बस्तियां ही नहीं, कईं गांव भी बाढ़ में बहकर अतीत की कहानी बन चुके हैं। कई लोगों के लापता होने के समाचार भी मिल रहे थे। वास्तव में बाढ़ का प्रकोप इतना भयानक था कि उसकी भरपाई हम लोग आज तक नहीं कर पाए। इसी कारण आज भी मैं जब कहीं भी दूर निकट बाढ़ आने की बात सुनता हूं तो वह दृश्य सामने आकर मेरे रोम-रोम को कंपा देता है। ऐसा रोम कह उठता है कि आज का वैज्ञानिक मानव भी कितना विवश है प्रकृति के सामने!

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