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Hindi Essay on “Atamnirbharta” , ”आत्मनिर्भरता” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

आत्मनिर्भरता

Atamnirbharta

निबंध नंबर :01 

स्वावलम्बन अथवा आत्मनिर्भरता दोनों का वास्तविक अर्थ एक ही है – अपने सहारे रहना अर्थात अपने आप पर निर्भर रहना | ये दोनों शब्द स्वय परिश्रम करके, सब प्रकार के दुःख –कष्ट श कर भी अपने पैरो पर खड़े रहने की शिक्षा और प्रेरणा देने वाले शब्द है | यह हमारी विजय का प्रथम सोपान है | इस पर चढकर हम गन्तव्य-पथ पर पहुँच पाते है | इसके द्वारा ही हम सृष्टि के कण-कण को वश में कर लेते है | गांधी जी ने कहा है कि व्ही व्यक्ति सबसे अधिक दुःखी है जो दुसरो पर निर्भर रहता है | मनुस्मृति में कहा गया है – जो व्यक्ति बैठा है उसका भाग्य भी बैठा है और जो व्यक्ति सोता है , उसका भाग्य भी सो जाता है, परन्तु जो व्यक्ति अपना कार्य स्वय करता है, केवल उसी का भाग्य उसके हाथ में होता है | अत : सांसारिक दुखो से मुक्ति पाने की रामबाण दवा है – स्वावलम्बन |

स्वावलम्बी या आत्मनिर्भर व्यकित ही सही अर्थो में जान पाता है कि संसार में दुःख पीड़ा क्या होते है तथा सुख- सुविधा का क्या मूल्य एव महत्त्व हुआ करता है | वह ही समझ सकता है कि मान अपमान किसे कहते है ? अपमान की पीड़ा क्या होती है ? परावलम्बी व्यक्ति को तो हमेशा मान-अपमान की चिन्ता त्याग कर , व्यक्ति होते हुए भी व्यक्तित्वहीन बनकर जीवन गुजार देना पड़ता है | एक स्वतंत्र व स्वावलम्बी व्यक्ति ही मुक्तभाव से सोच-विचार कर के उचित कदम उठा सकता है | उसके द्वारा किए गे परिश्रम से बहने वाले पसीने की प्रत्येक बूंद मोती के समान बहुमूल्य होती है | स्वावलम्बन हमारी जीवन – नौका की पतवार है | यह ही हमारा पथ – प्रदर्शन है | इस कारण से मानव – जीवन में इसकी अत्यन्त महत्ता है |

विश्व के इतिहास में अनेको ऐसे उदाहरण भरे पड़े है जिन्होंने स्वावलम्बन से ही जीवन की ऊचइयो को छुआ था | अब्राहम लिंकन स्वावलम्बन से ही अमेरिका के राष्ट्रपति बने थे | मैकड़ानल एक श्रमिक से इंग्लैण्ड के प्रधानमत्री बने थे | फोर्ड इसी के बल पर विश्व के सबसे धनी व्यक्ति बने थे | भारतीय इतिहास में भी शंकराचार्य , ईश्वरचन्द्र विद्दासागर, स्वामी रामतीर्थ , राष्ट्रपति गांधी जी , एकलव्य लाल भुदुर शास्त्री आदि महापुरुषों के स्वावलम्बन शक्ति के उदाहरण भरे पड़े है |

अनुचित लाड़-प्यार , मायामोह , आलस्य , भाग्यवाद, अन्धविश्वास आदि स्वावलम्बन में बाधाएँ उत्पन्न करते है | इनके अतिरिक्त बच्चो को हतोत्साहित करना या उन पर अंकुश लगाना भी उनके विकास में बाधा उत्पन्न करते है | वास्तव में ये सभी स्वावलम्बन के शत्रु है | अत: इनसे दूर रहना ही हितकर है | स्वावलम्बन की महिमा अपरम्पार है | परिश्रमी को सदा ही सुखद फल की प्राप्ति हई है |

आज का व्यक्ति अधिक – से-अधिक धन तथा सुख प्राप्त करना तो चाहता है पर वह दुसरो को लुट – खसोट कर प्राप्त करना चाहता है अपने परिश्रम और स्वय पर विश्वास व निष्ठा रखकर नही | इसीलिए वह स्वतंत्र होकर भी परतंत्र और दुखी है | इस स्थिति से छुटकारा पाने का एक ही उपाय है और वह है स्वावलम्बी एव आत्मनिर्भर बनना |  

निबंध नंबर :02

स्वावलम्बन (आत्मनिर्भरता)

Swavlamban – Atamnirbharta

प्रस्तावना- स्वावलम्बन अथवा आत्मनिर्भरता दोनों का ही अर्थ है- हमें अपने सहारे रहने अर्थात् स्वयं पर निर्भर रहना। ये दोनों ही शब्द हमें स्वयं परिश्रम करने, सभी प्रकार के दुःख एवं कष्टों को सहकर भी अपने पैरों पर खड़े रहने की शिक्षा और प्रेरणा देते हैं। यह हमारी जीत की प्रथम सीढ़ी है। इस पर चढ़कर ही हम ऊंचाई पर पहुंच पाते हैं। इसे अपनाकर सृष्टि के कण-कण को वश में किया जा सकता है।

स्वावलम्बन की विशेषता-गाँधी जी के अनुसार-‘जो व्यक्ति आत्मनिर्भर न होकर दूसरों पर निर्भर रहता है, वह सबसे अधिक दुःखी व्यक्ति होता है।

स्वावलम्बी या आत्मनिर्भर व्यक्ति ही सही अर्थों में जान पाता है कि संसार मे दुःख-दर्द क्या है, मान-सम्मान किसे कहते हैं, अपमान की पीड़ा क्या होती है, सुख-सुविधा का क्या मूल्य एवं महत्व होता है?

एक स्वतन्त्र व स्वावलम्बी व्यक्ति ही मुक्त भाव से सोच-विचार करके उचित कदम उठाता है। स्वावलम्बी मानव ही जीवन रूपी नौका की पतवार है। यह ही हमारा प्रदर्शक है।

स्ववालम्बन की आवश्यकता- विश्व में अनेक ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होनें स्वावलम्बन पर आत्मनिर्भरता से ही संसार की बुलंदियों को छुआ है। स्वावलम्बन से ही अब्राहम लिंकन अमेरिका के राष्ट्रपति बने। मैक्डानल एक श्रमिक थे लेकिन स्वावलम्बन के बल पर वे एक दिन इंग्लैड के प्रधानमन्त्री बने। भारतीय इतिहास में भी धीरूभाई अम्बानी, लक्ष्मी मितल, राष्ट्रपिता गाँधी जी, अमिताभ बच्चन, लाल बहादुर शास्त्री, शंकराचार्य, एकलव्य आदि अनेक महापुरूषों ने स्वावलम्बन शक्ति के उदाहरण प्रस्तुत किये।

स्वावलम्बन के शत्रु- अत्यधिक लाड़-प्यार, धन-मोह, आलस्य, अन्धविश्वास, भाग्यवाद आदि स्वावलम्बन के मार्ग में बाधाएं उत्पन्न करते हैं। इनके अतिरिक्त बच्चों का उत्साह कम करना, या उन्हें किसी काम को करने से रोकना बच्चों में स्वावलम्बन की कमी पैदा करता है। वास्तव मंे ये सभी स्वावलम्बन के शत्रु हैं। स्वावलम्बन की महिमा अपरम्पार है। स्वावलम्बन के द्वारा परिश्रमी व्यक्ति सुखद फल प्राप्त करता है।

उपसंहार- युग में अनेक व्यक्ति दूसरों को लूट-खसोट कर अधिक-से-अधिक धन तथा सुख प्राप्त करना चाहते हैं। उन्हें अपने परिश्रम और स्वंय पर अधिक विश्वास नहीं होता जिस कारण वे स्वतन्त्र होकर भी दुःखी और परतन्त्र रहते हैं।
अतः स्वावलम्बन अथवा आत्मनिर्भरता द्वारा हम ऐसी स्थितियों से छुटकारा पा सकते हैं।

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