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Hindi Essay on “America ka Bharat par Prabhav” , ”अमेरिका का भारत पर प्रभाव” Complete Hindi Essay for Class 10, Class 12 and Graduation and other classes.

अमेरिका का भारत पर प्रभाव

America ka Bharat par Prabhav

 

                अमेरिकी प्रतिरक्षा प्रणाली से भारत बिना प्रभावित हुए नहीं रह सकता। यद्यपि भारत ने उसकी प्रतिरक्षा प्रणाली का समर्थन किया है तथापि बाद में यह स्पष्ट किया कि हमने अंतरिक्ष में उन्नत प्रौद्योगिकी वाले शस्त्र तैनात किए जाने का समर्थन नहीं किया बलिक राष्ट्रपति बुश की घोषणा के उस हिस्से का समर्थन किया है जिसमें उन्होंने कहा था कि विश्व को शीत युद्ध के दिनों के परमाणु शस्त्रों के आतंक तथा दोनों ओर के सुनिश्चित विनाश की आशंका से बाहर निकाला  जाना चाहिए। साथ ही भारत ने राष्ट्रपति बुश के इस कथन का समर्थन किया कि अमेरिका की राष्ट्रीय प्रक्षेपास्त्र प्रणाली की पुष्टि विश्व की मान्यता प्राप्त परमाणु शक्तियों, विशेषकर रूस ने कर दी है। साथ ही भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि परमाणु शस्त्रास्त्रों के भण्डारों में कमी तो भारत की निरस्त्रीकरण की नीतियों का हिस्सा रही ही है और इसी आधार पर हमने इसका समर्थन किया है।

                कुल मिलाकर भारत पर तथा उसके आस-पास के सुरक्षा परिदृश्यों पर इस प्रणाली के निम्नलिखित प्रभावों को चिहिृत किया जा सकता है-

                अमेरका प्रतिरक्षा प्रणाली के समर्थन से भारत का प्रक्षेपास्त्र कार्यक्रम प्रभावित होगा। भारत के भी प्रक्षेपास्त्र उसी प्रकार विफल हो जाएंगे जिस प्रकार दूसरे देशों के।

                यद्यपि अमेरिका ने इस प्रणाली की सुरक्षा छतरी मित्र राष्ट्रों को भी उपलब्ध कराने का दवा प्रकट किया है तथापि भारत कभी भी अमेरिका को अपना विश्वसनीय साथी नहीं मान सकता।

                भारत के रूस के साथ संबंध प्रभावित होंगे। यद्यपि कि रूस ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका की इस प्रणाली के समर्थन से भारत-रूस रक्षा सहयोग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

                चीन अपने छोटी तथा मध्यम दूरी के प्रक्षेपास्त्रों के विफल होने से अपने मौजूदा परमाणु कार्यक्रमों के आधुनिकीकरण को और बढ़ाएगा तथा लम्बी दूरी तक प्रहार करने वाले प्रक्षेपास्त्रों के आकार तथा क्षमता का विस्तार करेगा। और तो और चीन इन नए प्रक्षेपास्त्रों में शत्रु की मिसाइल रक्षा प्रणाली को भेदने की शक्ति का भी विकास कर सकता है। जाहिर है कि यदि चीन ने ऐसी क्षमता हासिल कर ली तो वह भारत की सुरक्षा के लिए काफी खतरनाक होगा।

                भारत-ईरान के संबंध इस समय बेहतर होते दिखाई पड़ रहे हैं। लेकिन ये संबंध बिगड़ भी सकते हैं। क्योंकि अमेरिका ने ईरान को राॅग्न नेशन की श्रेणी में रखा है और भारत ने उसका समर्थन किया है।

                भारत के समर्थन के बाद चीन और रूस का और करीब आना स्वाभाविक है।

                चीन की परमाणु तथा प्रक्षेपास्त्र क्षमता बढ़ने की स्थिति में यह सहज कल्पना की जा सकती है कि जापान भी जवाबी कार्यवाही की तैयारी करेगा।

                पाकिस्तानी सरकार ने भी अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। उसका कहना है कि अमेरिका की यह प्रणाली विश्व तथा इस क्षेत्र की सुरक्षा के लिए हितकर नहीं है।

                उपर्युक्त विवेचन यह स्पष्ट करता है कि यह प्रणाली अमेरिका की अति महŸवाकांक्षा का परिणाम है। इस समय अमेरिका दुनिया की एकमात्र सुपर पाॅवर है और इस बादशाहत को बनाए रखने के लिए उसने एन.एच.डी. का विकास किया है ताकि भविष्य में कोई भी राष्ट्र उसे चुनौती न दे सके। परन्तु भारत का जहां तक प्रश्न है उसे अत्यधिक सतर्क तथा दूरदृष्टि का परिचय देना होगा और साथ ही इस प्रश्न पर भी विचार करना होगा कि अमेरिकी प्रणाली को समर्थन देते हुए वह अपने स्वंय के परमाणु तथा प्रक्षेपास्त्रों के विकास के कार्यक्रमों की स्वतंत्रता को खुला रखे। साथ ही रूस, चीन तथा ईरान के साथ सार्थक सहयोग कैस जारी रखा जाए क्योंकि भारत की सुरक्षा की दृष्टि से इन राष्ट्रों का विशेष सामरिक महत्व है। यदि अमेरिकी सुरक्षा प्रणाली के चलते पाकिस्तान तथा चीन अपनी क्षमताएं बढ़ाते हैं तो भारत के पास उसका विकल्प होगा।

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